साहित्यकार-सम्मान समारोह

नमामि गंगे विशेषांक का लोकार्पण एवम् साहित्यकार-सम्मान समारोह

दिनांक ६ नवम्बर, २०१६ को माधव सभागार, केरालानगर में सम्पन्न उक्त कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रबन्धक श्री पवनपुत्र बादल ने कार्यक्रम के स्वरूप पर प्रकाश डाला। राष्ट्रधर्म मासिक) पत्रिका के सम्पादक ओमप्रकाश पाण्डेय जी ने नमामि गंगे विशेषांक का परिचय दिया। उन्होंने ने कहा कि वेदकाल के अनन्तर, पुराणों में इस नदी की विशिष्ट आध्यात्मिक प्रतिष्ठा परिलक्षित होती है। जब यह ‘ग’ से उपलक्षित पाँच श्रेष्ठतम विभूतियों गंगा, गायत्री, गणेश, गुरु और गीता के शिखर पर आरूढ़ हुई। ‘गं गं’ का उद्घोष करती हुई इस नदी का नामकरण भी इसी आधार पर सम्पन्न हुआ। गंगा-तट पर किया गया महीने भर का कल्पवास, विशेष रूप से माघमास में जन्म-जन्मान्तर के संचित पाप-ताप का नाशक माना जाता है। हरिद्वार, प्रयाग और काशी- सदृश तीन-तीन पुरियों अवस्थित हैं गंगा के तटों पर। हिमालय से निकलकर विस्तृत भूमि को पवित्र करती हुई यह नदी सर्वाधिक भारतीय भू-भाग को सींचकर उपजाऊ बनाती है। गंगा-यमुना की मध्यवर्तिनी यह भूमि अक्षरशः सोना-चाँदी की तरह कृषि सम्पदा प्रदान करती है।

यह शिव की वह प्रिया है, जो उनके सिर पर चढ़ी रहती है। इसी के प्रेम में आबद्ध भोलेबाबा काशी में ही बने रहते है- भले ही पार्वती माता उन्हें बार-बार कैलास ले जाने के लिए प्रयत्नशील रहती हों। माना जाता है कि काशी में दशाश्वमेध घाट के पास बहती हुई गंगा की धारा कदाचित् उमड़कर बाबा विश्वनाथ का स्वयं सर्वप्रथम अभिषेक करती थी। प्रयाग में बड़ी बहन यमुना के कण्ठालिंगन में निमग्न गंगा की छवि परम शिवभक्त कविकुलगुरु कालिदास को भी इन्द्रनीलमणियों से गुँथी हुई मुक्तामाल लगती है और कभी नीले और श्वेतकमलों की सम्मिलित माला प्रतीत होती है, लेकिन अगले ही क्षण वह भस्म का अंगराग लगाये महाशिव की देह हो जाती है।

समर्थ और सुयोग्य गुरु की खोज में सम्पूर्ण काशीपुरी को छान रहे कबीर की इच्छापूर्ति हुई गंगा के तट पर, जहाँ बहुत सवेरे स्नान-हेतु आये स्वामी रामानन्द के चरण घाट की सीढ़ियों पर लेटे हुए कबीर पर अनायास ही पड़ गये। खोज पूरी हुई, साधक को साधना के लिए सुदृढ सोपान मिल गया। सिद्धि की सम्भावना प्रबल हो गयी। कितने ही सन्तों और साधकों की अध्यात्म-साधना गंगा मैया की इन्हीं सीढ़ियों पर सम्पन्न हुई। इसका लेखा-जोखा स्वयं जहु-न जहु-नन्दिनी के अतिरिक्त किसके पास होगा? काशी में गंगा के घाटों पर कितने शास्त्रार्थ सम्पन्न हुए कितनों को मोक्ष की प्राप्ति भी हुई और कितनों को ज्ञान की प्राप्ति हुई. गुरु और सिद्धि की प्राप्ति हुई पर हम सबके दुर्भाग्य से या हमारी स्वार्थजन्य उपेक्षा से सबके पाप-ताप-सन्ताप हरनेवाली माँ गंगा आज स्वयं मलिन हो गयी है। इसे स्वच्छ करने में यदि हम सब अब भी असफल रहे तो सारस्थत साधकों तथा मनीषियों की वह टोली, जो कि गंगा के किनारे चाण्डाल तक बनकर रहने की इच्छुक है, मुझे कभी क्षमा नहीं करेगी।

मौजूदा समय में देश में ऊर्जामय स्वरूप बन रहा है। यह समय काफी संघर्षों के बाद आया है। देश में एक प्रकार की विशिष्ट एकता दिखायी पड़ रही है, देश में जो चिन्तन बन रहा है, वही राष्ट्रधर्म है। देश की जनता जागरूक हो रही है, वह फौज के साथ खड़ी है और मौजूदा समय की फौज हमारी सेना हिमालय से भी टकराने के लिए तैयार है। पूरे देश में राष्ट्रवाद की लहर प्रवाहित हो रही है। ये बातें पश्चिम बंगाल के महामहिम राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी जी ने कहीं।
मुख्य अतिथि म.म. राज्यपाल जी ने गंगा की दुर्दशा का जिक्र नाते हुए कहा कि गंगा आज संकट में है। वह विभिन्न कारणों से दूषित और छोटी ती जा रही है। हम उसका प्रदूषण रोक पाने में अपने को सक्षम नहीं पा रहे हैं। लकी शुद्धता पर प्रश्नचिह लग गया है। हमें इस बात की चिन्ता करनी चाहिए कि गाको पुनर्जीवन कैसे दिया जाये? उसके मोक्षदायिनी व कल्याणदायिनी स्वरूप क ऐसे वापस किया जाये? राज्यपाल जी ने साहित्यकारों के देश के प्रति योगदान की नाहना करते हुए कहा कि साहित्यकार ही हास होती संस्कृति को बचाने का काम कर रहे हैं। सामाजिक विकृतियों को समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

साहित्यकारों का सम्मान- इस अवसर पर राज्यपाल जी ने विविध विधा के चहित्यकारों को सम्मानित किया। ‘राष्ट्रधर्म हिन्दी गौरव सम्मान’ से इम्फाल (मणिपुर)
डी प्रो. डॉ. हजारीमयुम सुवदनी देवी जी को अलंकृत किया गया। ‘राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान’ से लखनऊ की डॉ. अमिता दुबे एवं नोएडा के डॉ. अरुण हुमार भगत को सम्मानित किया गया। डॉ. संगीता सक्सेना (जयपुर) को व्हानी का प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। कहानी का द्वितीय पुरस्कार डॉ. निरुपमा राय (पूर्णिया, बिहार) को प्रदान किया गया। तृतीय पुरस्कार घनानन्द पाण्डेय ‘मेघ’ (लखनऊ) को प्रदान किया गया। प्रोत्साहन पुरस्कार श्रीमती लाडो कटारिया (गुरुग्राम, हरियाणा) को प्रदान किया गया। व्यंग्य लेख में प्रथम पुरस्कार विजय मिश्र (कानपुर) को प्रदान किया गया। व्यंग्य लेख
का प्रोत्साहन पुरस्कार श्री उमेश शुक्ल (लखनऊ) को प्रदान किया गया। कार्यक्रम में ओताओं के रूप में गणमान्य नागरिक, सहृदय साहित्य-मनीषी, संघ-परिवार, राष्ट्रधर्म प्रकाशन के कर्मचारी तथा
राष्ट्रधर्म के बहुसंख्यक अभिकर्तागण सम्मिलित हुए कार्यक्रम का सुचारु सञ्चालन राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड के प्रबन्धक पवनपुत्र बादल जी के द्वारा तथा आभार प्रदर्शन एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रभारी निदेशक सर्वेशचन्द्र द्विवेदी द्वारा किया गया। श्रीमती दीप्ति वर्मा द्वारा वन्दे मातरम् के गायन के पश्चात कार्यक्रम विसर्जित हुआ। कार्यक्रम में श्री आनन्द मोहन चौधरी (पूर्व निदेशक), चन्द्रप्रकाश शुक्ल (निदेशक) एवं डॉ. सुशील चन्द्र त्रिवेदी मधुपेश की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

राष्ट्रधर्म विशेषांक का लोकार्पण करते (बायें से) पवनपुत्र बादल, ओम प्रकाश पाण्डेय, सर्वेश चन्द्र द्विवेदी, मा. केशरीनाय लिपाठी, सुशील चन्द्र लिवेदी एवं आनन्द मोहन चौघरी

"सिंहावलोकन” विशेषांक का लोकार्पण एवम् साहित्यकार-सम्मान समारोह

अनुसार सही मन्त्र अथवा सुनीति के अभाव में राष्ट्र का न तो समुचित विकास हो पाता है और न वह सुरक्षित ही रहता है।

उन्होंने राष्ट्रधर्म’ के आद्य सम्पादकों श्री अटल बिहारी वाजपेयी, स्व. राजीवलोचन अग्निहोत्री तथा प्रबन्ध उपदेशक-मण्डल मा. श्री भाऊराव देवरस, पं. दीनदयाल उपाध्याय और श्री नानाजी देशमुख के तत्कालीन अभावग्रस्त जीवन -क्रम, कठोर परिश्रम और सम्पूर्ण समर्पण की भी चर्चा की। उन्होंने राष्ट्रधर्म को विपरीत परिस्थितियों के करण-हेतु एक विशिष्ट विचारयज्ञ बतलाया।

कार्यक्रम के संचालक डा. पवनपुत्र बादल ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में कहा कि कभी-कभी पं. दीनदयाल उपाध्याय ही मशीन मैन के न आने पर मशीन भी चलाना पड़ता था और इसी क्रम में एक बार तो वे मशीन चलाते-चलाते गिर भी पड़े थे। रास्ट्रधर्म
के प्रभारी निदेशक श्री सर्वेशचन्द्र द्विवेदी ने कार्यक्रम के माननीय अध्यक्ष न.म. श्री राज्यपाल, मुख्य अतिथि मुख्यमन्त्री डा. दिनेश शर्मा तथा खचाखच भरे सभागार में विराजमान साहित्यकारों, पत्रकारों, संघ के वरिष्ठा एवं अधिकारियों, सहृदय साहित्य प्रेमियों एवं ‘राष्ट्रधर्म’ के कर्मठ अभिकर्ताओं के प्रति साधुवाद अर्पित करते हुए के अंकों को घर-घर पहुँचाने की अपील की।

हमें ‘वन्दे मातरम्’ के साथ मुख्य कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इसके बाद साहित्य-संगोष्ठी में साहित्यकारों ने गेन वातावरण में साहित्य की भूमिका की विशद चर्चा की।

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