डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ जी की गरिमामयी उपस्थिति में राष्ट्रीय बैठक संपन्न

दिनांक 7–8 फरवरी 2026 को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के पदाधिकारियों की महत्वपूर्ण बैठक हुबली, कर्नाटक में सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
इस बैठक में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। बैठक में संगठन के विस्तार, साहित्यिक गतिविधियों के सशक्त संचालन तथा आगामी योजनाओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई।
“जब नेतृत्व अनुभवी हो और उद्देश्य राष्ट्रहित, तब हर बैठक परिवर्तन की दिशा में एक निर्णायक कदम बन जाती है।”

अखिल भारतीय साहित्य परिषद लखनऊ, दक्षिण

 दिनांक 25.01.2026 को अभिनंदन समारोह एवं संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका विषय था संघ साहित्य समग्र चिंतन प्रवाह। संगोष्ठी में दक्षिण इकाई की अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ नीतू शर्मा द्वारा संचालन किया गया। प्रोफेसर शर्मा ने सभी अतिथियों का स्वागत किया एवं श्रीमती संगीता पाल द्वारा सरस्वती वंदना गान एवं दीप प्रज्वलन से कार्यक्रम की शुरुआत हुई इसके पश्चात् श्री राजीव वत्सल द्वारा परिषद गीत प्रस्तुत किया गया। इसके पश्चात् मंचस्थ विद्वजनों को पुष्पमाला, अंगवस्त्र एवं पौधा देकर अभिवादन किया गया।
इसके बाद डॉ बलजीत श्रीवास्तव ने संगोष्ठी में विषय प्रवर्तन करते हुए अपने वक्तव्य में संघ के सौ वर्ष पूर्ण करने पर हर्ष जताया तथा संघ साहित्य पर रचित १५०० पुस्तकों की सूची पर भी प्रकाश डाला। अपने वक्तव्य में डॉ बलजीत श्रीवास्तव ने हर विधा में संघ साहित्य की उपलब्धता पर प्रकाश डाला।
इसके बाद दक्षिण इकाई की डॉ. मधुलिका चौधरी ने कार्यकम में अपने वक्तव्य में बताया किस तरह पाश्चात्य संस्कृति के चकाचौंध में पड़कर भारतीय संस्कृति को छोड़ते जा रहे हैं और राष्ट्र के पुनर्निमाण पर बल देते हुए प्रकृति और विज्ञान को जोड़ने की बात कही।
तत्पश्चात प्रांत अध्यक्ष श्री विजय त्रिपाठी जी ने संघ के इतिहास के बारे में बताया। तथा आजादी की अलख जगाने वाले संघ के गीतों के बारे में विस्तृत चर्चा की।
इसके बाद कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण राष्ट्रीय अध्यक्ष और राष्ट्रीय महामंत्री का अभिनंदन था जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ . सुशील चंद्र त्रिवेदी जी और मुख्य अतिथि डॉ पवन पुत्र बादल जी का अभिनंदन प्रतीक चिह्न,अंग वस्त्र और पुष्प माला पहना कर किया गया। इसके बाद डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी जी ने कार्यक्रम में अपने उदबोधन् में संघ की विचारधारा और संघ साहित्य का प्रदेय पर अपने विचार व्यक्त किये।
तत्पश्चात विशिष्ट वक्ता प्रो. हरिशंकर मिश्र जी ने संघ साहित्य समग्र चिंतन प्रवाह पर अपने विचार व्यक्त किए उन्होंने राष्ट्र के सुदृढ़ होने और राष्ट्र के विकास के मार्ग को सुदृढ़ करने की प्रेरणा दी, अहम राष्ट्र के सूक्ति को विस्तृत रूप से चर्चा की उन्होंने कहा हम राष्ट्र के हैं और राष्ट्र हमारा है, मिश्र जी ने कलिः शयानो भवति “उत्तिष्ठंस्त्रेता भवति कृतं संपद्यते चरन् ” सूक्ति द्वारा चारों युग के बारे में अपने विचार रखें।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवन पुत्र बादल जी ने भारतीय परंपरा और पाश्चात्य की तुलना करते हुए इसके मूल पर ध्यान आकर्षित किया , संघ के इतिहास पर बात करते हुए उससे जुड़े लोगों के त्याग को याद किया।
अंत में डॉ. पूनम सिंह द्वारा अध्यक्ष तथा मुख्य अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापित किया गया एवं श्रीमती संगीता पाल द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर भारत माता गीत और राष्ट्र गीत की प्रस्तुति के बाद डॉ कुमुद् पाण्डे द्वारा शांति मंत्र करते हुए कार्यक्रम की समाप्ति हुई।
कार्यक्रम में डॉ धीरेंद्र कौशल, डॉ सुरसरि तरंग मिश्र, डॉ जाह्नवी अवस्थी, श्रीमती ज्योति किरण,प्रांत प्रचार मंत्री श्री सर्वेश पाण्डे ‘विभि’ महानगर इकाई से अध्यक्ष श्री निर्भय नारायण गुप्त, महामंत्री डॉ ममता पंकज, श्री शशि कांत द्विवेदी, तथा भारी संख्या में शोधार्थी व छात्र छात्राएं उपस्थित थे।

अवधी भाषा के विकास यात्रा" विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

डॉ राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय, अल्लीपुर, हरदोई तथा उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में महाविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में ” अवधी भाषा के विकास यात्रा” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ मां शारदे के समक्ष दीप प्रज्जवलित एवं पुष्पर्जन कर किया । श्री कौशलेंद्र प्रताप सिंह “राष्ट्रवर”ने वाणी वंदना प्रस्तुत की।

मुख्य अतिथि श्री कमलेश कमल-जन सम्पर्क अधिकारी एवं प्रकाशन प्रमुख,ITBP, नई दिल्ली ने उद्बोधन में कहा कि अवधी भाषा की विकास यात्रा अर्द्धमागधी अपभ्रंश से शुरू हुई, जो कोसल (अयोध्या) क्षेत्र की ‘कोसली’ बोली से विकसित होकर, भक्तिकाल में तुलसीदास (रामचरितमानस) और जायसी (पद्मावत) जैसे कवियों के हाथों साहित्यिक भाषा बनी, जिसने प्रेमाख्यान और भक्ति काव्य को समृद्ध किया।
स्वागत व संस्थान परिचय डॉ देवी प्रसाद तिवारी ने रखा।

संगोष्ठी की मुख्य वक्ता डॉ. अमिता दूबे प्रधान संपादक,उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ ने कहा आधुनिक काल में खड़ी बोली के प्रभाव से इसका साहित्यिक रूप सीमित हुआ, पर लोक-साहित्य और भाषा-अध्ययन में इसका महत्व आज भी बना हुआ है, जो इसे हिंदी की एक महत्वपूर्ण पूर्वी उपभाषा के रूप में स्थापित करता है। प्राचीन काल से अवधी की जड़ें इंडो-आर्यन भाषा परिवार में हैं और यह अर्द्धमागधी प्राकृत से विकसित हुई मानी जाती है। प्राचीन कोसल (अयोध्या) क्षेत्र की स्थानीय बोली, जिसे ‘कोसली’ कहा जाता था, अवधी के विकास का आधार बनी।

संगोष्ठी के अध्यक्ष और सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान के संस्थापक- प्रबंधक तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ सुशील चंद्र त्रिवेदी”मधुपेश” ने कहा कि भक्तिकाल अवधी का सबसे स्वर्ण काल था, जब इसे साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिली।*
गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ की रचना करके अवधी को उत्कर्ष प्रदान किया, जो इसका सबसे महान काव्य ग्रंथ है। मलिक मुहम्मद जायसी ने ‘पद्मावत’ जैसे प्रेमाख्यान (सूफी काव्य) लिखे, जिससे अवधी का साहित्यिक स्वरूप और निखरा अन्य संत कवि जैसे मलूकदास ने भी अवधी में रचनाएं कीं।

विशिष्ट अतिथि डॉ ब्रह्म स्वरूप पांडे ने कहा कि रीतिकाल एवं आधुनिक काल भक्तिकाल के बाद अवधी का काव्य भाषा के रूप में प्रयोग कम हुआ, पर यह समाप्त नहीं हुआ।
1857 के विद्रोह के केंद्र अवध में मौखिक साहित्य की रचना हुई और बलभद्र प्रसाद ‘पढीस’, बंशीधर शुक्ल जैसे कवियों ने इस काल में अवधी में लिखा।आधुनिक काल में खड़ी बोली के बढ़ते प्रभाव के कारण अवधी का साहित्यिक विकास कुछ हद तक अवरुद्ध हुआ और इसे अक्सर हिंदी की एक बोली मान लिया जाता है। आज भी यह उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र (लखनऊ, अयोध्या, रायबरेली आदि) में व्यापक रूप से बोली जाती है और लोक साहित्य तथा आंचलिक रचनाओं में इसका प्रयोग होता है। इसे कोजली, कोसली, बैसवारी आदि नामों से भी जाना जाता है।मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, कभी-कभी कैथी लिपि का भी प्रयोग होता है।

संगोष्ठी में जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन मोहन पाण्डेय, डॉ ईश्वर चंद्र वर्मा, श्री निशानाथ अवस्थी”निशंक”, श्री राजकुमार सिंह “प्रखर” ,श्री विपिन त्रिपाठी, श्री सुखदेव पाण्डेय “सरल”, श्री अरविन्द मिश्र, डॉ.शीला पाण्डेय, डॉ राहुल सिंह,आदि को सम्मानित किया गया ।

डॉ देश दीपक शुक्ल ने संगोष्ठी का संचालन करते हुये कहा हिंदी के विकास में अवधी का अमिट प्रभाव रहा है, और इसे आधुनिक हिंदी की नींव रखने वाली भाषाओं में से एक माना जाता है। अवधी एक समृद्ध ऐतिहासिक और साहित्यिक परंपरा वाली भाषा है, जिसने भक्ति और प्रेम-काव्य के माध्यम से हिंदी साहित्य को अनमोल धरोहर दी है और आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है।

संगोष्ठी में श्रीमती स्नेहल पांडे अध्यक्ष सार्वजनिक शिक्षण एवं संस्थान तथा भारी संख्या में छात्र-छात्राएं व डॉ शशिकांत पाण्डेय, डॉ विवेक बाजपेई, डॉ रश्मि द्विवेदी, श्री आनन्द विशारद, शुभम मिश्रा , दीपक कुमार, संजीव अस्थाना आदि शिक्षक गण व शिक्षणेत्तर कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

अल्लीपुर, हरदोई में आयोजित राज्य स्तरीय जूनियर खो-खो प्रतियोगिता 2025

SSS NGO सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान द्वारा संचालित डॉ. राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय, अल्लीपुर, हरदोई में आयोजित राज्य स्तरीय जूनियर खो-खो प्रतियोगिता – 2025 का भव्य उद्घाटन दिनांक 21 नवम्बर 2025 को अत्यंत गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। जिसमें विभिन्न जनपदों से आए अलग-अलग विद्यालयों के होनहार खिलाड़ियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. सुशीलचंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ जी (संस्थापक/प्रबंधक – सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय साहित्य परिषद्) की गरिमामयी उपस्थिति में ट्रॉफी पूजन एवं विधिवत उद्घाटन के साथ हुआ। इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों द्वारा सभी टीमों का तिलक व पुष्पगुच्छ भेंट कर आत्मीय स्वागत किया गया तथा खेल भावना के साथ प्रतियोगिता आरंभ करने का आह्वान किया गया

भारतीय परंपरा में नारी शक्ति की अवधारणा

🌺 नारी शक्ति : संस्कृति, संस्कार और सृजन की आधारशिला 🌺
उत्तर प्रदेश महिला कल्याण निगम, लखनऊ के सहयोग से SSS NGO – सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान द्वारा संचालित कृष्ण कुटीर महिला आश्रय सदन, वृन्दावन (मथुरा) में दिनांक 13 दिसंबर 2025 को “भारतीय परंपरा में नारी शक्ति की अवधारणा” विषय पर एक अत्यंत प्रेरक एवं विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ
🌸 अध्यक्ष – श्रीमती स्नेहिल पाण्डेय जी
द्वारा किया गया, जिन्होंने नारी सम्मान और सशक्तिकरण पर अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पधारे
🌟 पद्मश्री अलंकृत डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी
(प्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक, लेखक एवं अभिनेता)
ने भारतीय सभ्यता में नारी को शक्ति, करुणा और संस्कार की जीवंत प्रतिमूर्ति बताते हुए उपस्थित माताओं एवं अतिथियों को आत्मविश्वास और आत्मगौरव से भर दिया।

संगोष्ठी में
📖 प्रोफेसर दिनेश खन्ना जी
एवं
✍ संस्थापक/प्रबंधक – डॉ. सुशीलचंद्र त्रिवेदी ‘मधुपेश’ जी
ने अपने विचार रखते हुए कहा कि नारी केवल परिवार ही नहीं, अपितु संपूर्ण समाज की दिशा और दशा तय करने वाली शक्ति है।

यह संगोष्ठी नारी चेतना, आत्मबल और भारतीय मूल्यों को पुनः जागृत करने वाला एक अविस्मरणीय आयोजन सिद्ध हुआ

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाॅ. सुशीलचंद्र त्रिवेदी “मधुपेश” एवं मा. राजेन्द्र शुक्ल
उप मुख्यमन्त्री ,मध्यप्रदेश सरकार का पारस्परिक वैचारिक आदान-प्रदान ।

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